लक्ष्य जीवन की दिशा व् दशा को निर्धारित
करता है | इसी से जीवन की सफलता एवं सार्थकता सिद्ध होती है | लक्ष्यविहीन जीवन भूलभुलैयों
के भटकाव में भटकता रहता है | इसके अभाव में कहीं रास्ता नहीं मिलता | लक्ष्य को
निर्धारित किये बगैर अपनी आंतरिक शक्तियो के प्रयोग एवं उपयोग की सही दिशा ही
सुनिश्चित नहीं होती | जीवन की अपार एवं अपरिमित संभावनाए आकार लेने से पहले ही
मुरझाने-कुम्हलाने लगती है |
जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता है – लक्ष्य का
चयन | इसके लिए परम आवश्यक है – लक्ष्य की खोज | लक्ष्य को निर्धारित करते समय
अपने अंतर्मन की पड़ताल करना जरुरी है | अंतर्मन की पड़ताल में पहली बात है – स्वयं
में समायी प्रतिभा की पहचान | यानि कि एक-एक करके उन सभी विशेषताओ को जानना, जो
अपनी अभिव्यक्ति के लिए छटपटा रही है, कसमसा रही है | इस क्रम में दूसरी बात है –
ईश्वरप्रदत्त वह स्फुरणा , जो प्रारंभिक दिनों से हमें तरंगित करती रही है | इस
स्फुरणा को पहचानने के लिए बस, यह जानना जरुरी है कि वह कौन सी प्रेरणा है जिसने
बार बार हमारे मन के मर्म को छुआ है | तीसरी बात है – वे चुनौतियाँ जो बार-बार
हमारी राहों में आकर खड़ी हुई है और जिनसे हम आज भी घिरे है |
चौथे बिंदु के रूप में हमारे अपने जीवन
मूल्य है जिन्हें हमने अपनी साँसों में बसा रखा है | प्रायः ये कुछ श्रेष्ठ विचार
एवं श्रेष्ठ कर्तव्यों के रूप में हमारे साथ होते है और इन्हें हम किसी भी हाल में
छोडना नहीं चाहते | पाँचवाँ बिंदु उन संसाधनों के बारे में है, जो हमारे पास अभी
है , क्यूंकि यही वह पूँजी है , जो लक्ष्य की ओर बढते समय हमारे काम आएगी और छठा
बिंदु उन सुअवसरो के बारे में है, जिन्हें नियति ने हमें प्रदान कर रखा है | इन छह
बिन्दुओ के अतिरिक्त यदि कोई विशेष और महत्वपूर्ण बिंदु है तो वह है सांतवा आपका
अपना सपना, जिसकी इन्द्रधनुषी छटा प्रारंभ से ही आपके अन्तर्गगन पर छाई हुई है |
इस सपने को साकार करना हमारे जीवन का लक्ष्य हो सकता है , क्यूंकि यह सुखद सत्य है
कि हर दिल में एक सपना पैदा होता है , इसकी संभावनाओं पर हमें विश्वास होता है,
फिर हमारे सपने योजनाओं में बदलते है और तब परिणामस्वरूप चमत्कारिक ढंग से हमारा
सपना साकार होता है | अतः उपरोक्त बिन्दुओ पर भली भांति विचार करके ही लक्ष्य का
निर्धारण करना चाहिए |
इन बिन्दुओ को ध्यान में न रखकर केवल
पढकर, सुनकर या किसी के कहने पर लक्ष्य का निर्धारण कर लेने पर उसे प्राप्त कर
पाना मुश्किल है | प्रत्येक व्यक्ति मौलिक है | उसकी मौलिकता में ही उसका लक्ष्य
निहित होता है , ये ही उसका स्वधर्म होता है | लक्ष्य में जीवन की चरम संभावनाओ का
विकास निहित होता है | लक्ष्य वह होता है , जिसे पाकर पूर्ण संतुष्टि प्राप्त हो |
लक्ष्य वही होता है , जो जीवन का अर्थ बन जाए | लक्ष्य का निर्धारण करना वैसा ही
है, जैसे मकान बनाने से पूर्व उसका नक्शा बनाना |