गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

जगतजननी माँ सीता

जगतजननी माँ सीता  रामायण और रामकथा पर आधारित अन्य ग्रंथ, जैसे रामचरितमानसकंब रामायण की मुख्य नायिका हैं । 

सीता मिथिला में जन्मी थी, यह स्थान आगे चलकर सीतामढ़ी से विख्यात हुआ। 

देवी सीता मिथिला के नरेश राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री थीं । 

इनका विवाह अयोध्या के नरेश राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री राम से स्वयंवर में शिवधनुष को भंग करने के उपरांत हुआ था। 

इन्होंने स्त्री व पतिव्रता धर्म का पूर्ण रूप से पालन किया था जिसके कारण इनका नाम बहुत आदर से लिया जाता है। 

त्रेतायुग में इन्हें सौभाग्य की देवी लक्ष्मी का अवतार कहा गया है।

जन्म व नाम 

रामायण के अनुसार मिथिला के राजा जनक के खेतों में हल, जोतते समय एक पेटी से अटका। इन्हें उस पेटी में पाया था। 

राजा जनक और रानी सुनयना के गर्भ में इनके कलाओं एवं आत्मा की दिव्यता को महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा स्थापित किया गया तत्पश्चात सुनयना ने अपनी मातृत्व को स्वीकार किया और पालन किया। 

उर्मिला उनकी छोटी बहन थीं ।

राजा जनक की पुत्री होने के कारण इन्हे जानकीजनकात्मजा अथवा जनकसुता भी कहते थे। 

मिथिला की राजकुमारी होने के कारण यें मैथिली नाम से भी प्रसिद्ध है। 

भूमि में पाये जाने के कारण इन्हे भूमिपुत्री या भूसुता भी कहा जाता है।

विवाह 

ऋषि विश्वामित्र का यज्ञ राम व लक्ष्मण की रक्षा में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। 

इसके उपरांत महाराज जनक ने सीता स्वयंवर की घोषणा किया और ऋषि विश्वामित्र की उपस्थिति हेतु निमंत्रण भेजा। 

आश्रम में राम व लक्ष्मण उपस्थित के कारण वे उन्हें भी मिथिपलपुरी साथ ले गये। 

महाराज जनक ने उपस्थित ऋषिमुनियों के आशिर्वाद से स्वयंवर के लिये शिवधनुष उठाने के नियम की घोषणा की। 

सभा में उपस्थित कोइ राजकुमार, राजा व महाराजा धनुष उठानेमें विफल रहे। 

श्रीरामजी ने धनुष को उठाया और उसका भंग किया। इस तरह सीता का विवाह श्रीरामजी से निश्चय हुआ।

इसी के साथ उर्मिला का विवाह लक्ष्मण से, मांडवी का भरत से तथा श्रुतकीर्ति का शत्रुघ्न से निश्चय हुआ। 

कन्यादान के समय राजा जनक ने श्रीरामजी से कहा "हे कौशल्यानंदन राम! ये मेरी पुत्री सीता है। इसका पाणीग्रहण कर अपनी पत्नी के रूप मे स्वीकर करो। यह सदा तुम्हारे साथ रहेगी।" 

इस तरह सीता व रामजी का विवाह अत्यंत वैभवपूर्ण संपन्न हुआ। 

विवाहोपरांत सीता अयोध्या आई और उनका दांपत्य जीवन सुखमय था।

वनवास 

राजा दशरथ अपनी पत्नी कैकेयी को दिये वचन के कारण श्रीरामजी को चौदह वर्ष का वनवास हुआ। 

जगतजननी माँ सीता ने श्रीरामजी व अन्य बडों की सलाह न मानकर अपने पति से कहा "मेरे पिता के वचन के अनुसार मुझे आप के साथ ही रहना होगा। मुझे आप के साथ वनगमन इस राजमहल के सभी सुखों से अधिक प्रिय हैं।" 

इस प्रकार राम व लक्ष्मण के साथ वनवास चली गयी।

उन्होने चित्रकूट पर्वत स्थित मंदाकिनी तट पर अपना वनवास किया। 

इसी समय भरत अपने बड़े भाई श्रीरामजी को मनाकर अयोध्या ले जाने के लिए आये। 

अंतमे वे श्रीरामजी की पादुका लेकर लौट गये। 

इसके बाद वे सभी ऋषि अत्री के आश्रम गये। 

सीता ने देवी अनसूया की पूजा की। 

देवी अनसूया ने सीता को पतिव्रता धर्म का विस्तारपूर्वक उपदेश के साथ चंदन, वस्त्र, आभूषणादि प्रदान किया। 

इसके बाद कई ऋषि व मुनि के आश्रम गये, इसके पश्चात उन्होने दर्शन व आशिर्वाद पाकर पवित्र नदी गोदावरी तट पर पंचवटी में वास किया।

अपहरण 

पंचवटी में लक्ष्मण से अपमानित शूर्पणखा ने अपने भाई रावण से अपनी व्यथा सुनाई और उसके कान भरते कहा "सीता अत्यंत सुंदर है और वह तुम्हारी पत्नी बनने के सर्वथा योग्य है।" 

रावण ने अपने मामा मारीच के साथ मिलकर सीता अपहरण की योजना रची। 

इसके अनुसार मारीच सोने के हिरण का रूप धर राम व लक्ष्मण को वन में ले जायेगा और उनकी अनुपस्थिति में रावण सीता का अपहरण करेगा। 

आकाश मार्ग से जाते समय पक्षीराज जटायु के रोकने पर रावण ने उसके पंख काट दिये।

जब कोई सहायता नहीं मिली तो माता सीताजी ने अपने पल्लू से एक भाग निकालकर उसमें अपने आभूषणों को बांधकर नीचे डाल दिया। 

नीचे वनमे कुछ वानर इसे अपने साथ ले गये। 

रावण ने सीता को लंकानगरी के अशोकवाटिका में रखा और त्रिजटा के नेतृत्व में कुछ राक्षसियों को उसकी देख-रेख का भार दिया।

हनुमान जी से भेंट 

सीताजी से बिछड़कर रामजी दु:खी हुए और लक्ष्मण सहित उनकी वन-वन खोज करते जटायु तक पहुंचे। 

जटायु ने उन्हें सीताजी को रावण दक्षिण दिशा की ओर लिये जाने की सूचना देकर प्राण त्याग दिया। 

राम जटायु का अंतिम संस्कार कर लक्ष्मण सहित दक्षिण दिशा में चले। 

आगे चलते वे दोनों हनुमानजी से मिले जो उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित अपने राजा सुग्रीव से मिलाया। 

रामजी संग मैत्री के बाद सुग्रीव ने सीताजी के खोजमें चारों ओर वानरसेना की टुकडियाँ भेजीं। 

वानर राजकुमार अंगद की नेतृत्व में दक्षिण की ओर गई टुकड़ी में हनुमान, नीलजामवंत प्रमुख थे और वे दक्षिण स्थित सागर तट पहुंचे। 

तटपर उन्हें जटायु का भाई सम्पाति मिला जिसने उन्हें सूचना दी कि सीता लंका स्थित एक वाटिका में है।

हनुमानजी समुद्र लाँघकर लंका पहुँचे, लंकिनी को परास्त कर नगर में प्रवेश किया। 

वहाँ सभी भवन और अंतःपुर में सीता माता को न पाकर वे अत्यंत दुःखी हुए। 

अपने प्रभु श्रीरामजी को स्मरण व नमन कर अशोकवाटिका पहुंचे। 

वहाँ 'धुएँ के बीच चिंगारी' की तरह राक्षसियों के बीच एक तेजस्विनी स्वरूपा को देख सीताजी को पहचाना और हर्षित हुए।

उसी समय रावण वहाँ पहुँचा और सीता से विवाह का प्रस्ताव किया। 

सीता ने घास के एक टुकड़े को अपने और रावण के बीच रखा और कहा "हे रावण! सूरज और किरण की तरह राम-सीता अभिन्न है। राम व लक्ष्मण की अनुपस्थिति मे मेरा अपहरण कर तुमने अपनी कायरता का परिचय और राक्षस जाति के विनाश को आमंत्रण दिया है। रघुवंशीयों की वीरता से अपरचित होकर तुमने ऐसा दुस्साहस किया है। तुम्हारे श्रीरामजी की शरण में जाना इस विनाश से बचने का एक मात्र उपाय है। अन्यथा लंका का विनाश निश्चित है।" 

इससे निराश रावण ने राम को लंका आकर सीता को मुक्त करने को दो माह की अवधि दी और कहा कि इसके उपरांत रावण व सीता का विवाह निश्चित है। 

रावण के लौटने पर सीताजी बहुत दु:खी हुई। 

त्रिजटा राक्षसी ने अपने सपने के बारे में बताते हुए धीरज दिया की श्रीरामजी रावण पर विजय पाकर उन्हें अवश्य मुक्त करेंगे।

उसके जाने के बाद हनुमान सीताजी के दर्शन कर अपने लंका आने का कारण बताते हैं। श्रीरामजी की मुद्रिका देकर हनुमान कहते हैं कि वे माता सीता को अपने साथ श्रीरामजी के पास लिये चलते हैं। सीताजी हनुमान को समझाती है कि यह अनुचित है। रावण ने उनका हरण कर रघुकुल का अपमान किया है। अत: लंका से उन्हें मुक्त करना श्रीरामजी का कर्तव्य है। विशेषतः रावण के दो माह की अवधी का श्रीरामजी को स्मरण कराने की विनती करती हैं।

हनुमानजी ने रावण को अपनी दुस्साहस के परिणाम की चेतावनी दी और लंका जलाया। माता सीता से चूड़ामणि व अपनी यात्रा की अनुमति लिए चले। 

सागरतट स्थित अंगद व वानरसेना लिए श्रीरामजी के पास पहुँचे। 

माता सीता की चूड़ामणि दिया और अपनी लंका यात्रा की सारी कहानी सुनाई। 

इसके बाद राम व लक्ष्मण सहित सारी वानरसेना युद्ध के लिए तैयार हुई।

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

18 Aug My Views

 Just want to write something about my current situation.

It's not going on in a good direction.

I have taken a decision to quit from Teradata as the project Intel was very hectic and that was a long-pending decision. Finally, I relieved from TD on 31st Jul. and from that day onwards, I decided to take my life in a particular direction.

It's not as simple as that.

Now I am not able to concentrate on the studies.

I need to search the job again and that too in Pune.

I need to learn a few new things and search for the job in that field, not in Teradata. 

Don't know if that is a good decision or not.